सरल डेस्क
छत्रपति संभाजीनगर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि तकनीक का उद्देश्य मानव जीवन को सरल और समाज को सशक्त बनाना होना चाहिए, न कि इंसान को उसका गुलाम बनाना। उन्होंने जोर देकर कहा कि तकनीक अपने आप में न तो अच्छी है और न बुरी, बल्कि उसका उपयोग किस उद्देश्य से और किस सीमा तक किया जा रहा है, यही सबसे महत्वपूर्ण है।
छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान युवा उद्यमियों से संवाद करते हुए भागवत ने यह विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज के समय में तकनीक जीवन का अहम हिस्सा बन चुकी है, लेकिन अगर उस पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता बढ़ती है तो यह मानव की सोच, स्वतंत्रता और सामाजिक मूल्यों को प्रभावित कर सकती है।
स्वदेशी का मतलब तकनीक का विरोध नहीं
आरएसएस प्रमुख ने स्पष्ट किया कि स्वदेशी अपनाने का अर्थ यह नहीं है कि आधुनिक तकनीक को नकार दिया जाए। उन्होंने कहा, “स्वदेशी का मतलब यह है कि हम अपनी आवश्यकताओं, संस्कृति और समाज के हितों को ध्यान में रखते हुए तकनीक का उपयोग करें। तकनीक का विकास हो, लेकिन वह समाज के नियंत्रण में रहे, न कि समाज तकनीक के नियंत्रण में।”
उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे तकनीक का इस्तेमाल केवल मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण, रोजगार सृजन और देश के आत्मनिर्भर बनने के लक्ष्य के लिए करें।
अत्यधिक निर्भरता से खतरे
भागवत ने यह भी कहा कि तकनीक पर अत्यधिक निर्भरता से मानवीय संवेदनाएं, पारिवारिक रिश्ते और सामाजिक जुड़ाव कमजोर हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इंसान हर निर्णय मशीनों और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर छोड़ देगा, तो उसकी रचनात्मकता और विवेक शक्ति धीरे-धीरे कम हो जाएगी।
युवाओं से जिम्मेदारी निभाने की अपील
अपने संबोधन में उन्होंने युवा उद्यमियों को देश की रीढ़ बताते हुए कहा कि भारत का भविष्य उनके हाथों में है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे तकनीकी नवाचार को भारतीय जरूरतों और मूल्यों के अनुरूप विकसित करें, ताकि तकनीक मानव के लिए साधन बने, साध्य नहीं।
समाज के हित में तकनीक का संतुलित उपयोग जरूरी
कार्यक्रम के अंत में मोहन भागवत ने कहा कि तकनीक का संतुलित और जिम्मेदार उपयोग ही समाज को आगे बढ़ा सकता है। “जब तक इंसान तकनीक का मालिक है, तब तक विकास संभव है, लेकिन जिस दिन तकनीक इंसान की मालिक बन गई, उस दिन समस्याएं शुरू हो जाएंगी।”