सरल डेस्क
भारतीय चुनावों में स्टार प्रचारक कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार एक अलग प्रयोग देखने को मिला। मैथिलि ठाकुर ने राजनीति में ‘संगीत’ को हथियार बनाया। यह प्रयोग सिर्फ भीड़ जुटाने तक सीमित नहीं रहा। वेस्ट बंगाल में मैथिली का प्रभाव खास तौर पर दिखा। स्थानीय भाषा और लोक शैली ने उन्हें भीड़ से अलग बनाया। राजनीति में भावनात्मक जुड़ाव का यह मॉडल सफल रहा। यह बताता है कि संस्कृति, चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुकी है। तमिलनाडु और केरला में असर सीमित रहा। यहां क्षेत्रीय पहचान और स्थानीय नेतृत्व भारी पड़ा।
बाहरी प्रचारकों की अपील सीमित होती दिखी। यही भारतीय राजनीति की विविधता को भी दर्शाता है। असम में सांस्कृतिक जुड़ाव ने माहौल बनाया। स्थानीय भावनाओं से जुड़ने की रणनीति कारगर रही। पुडुचेरी में भी जनसभाओं का असर दिखा। यह संकेत है कि ‘सॉफ्ट पावर’ चुनावी हथियार बन सकता है।
मैथिली की छवि पारंपरिक नेता से अलग है। सादगी और सांस्कृतिक पहचान उनकी ताकत बनी। युवा और महिला मतदाताओं में उनकी लोकप्रियता बढ़ी। यह BJP के सामाजिक विस्तार का संकेत भी है। यह सवाल अब महत्वपूर्ण हो गया है। क्या भविष्य में और कलाकार राजनीति में इसी तरह उतरेंगे?
क्या चुनाव प्रचार में ‘भावनात्मक अपील’ बढ़ेगी ?
मैथिली का उदाहरण इस बदलाव की ओर इशारा करता है।अब वे सिर्फ भीड़ जुटाने वाली चेहरा नहीं रहीं। उनकी भूमिका चुनावी परिणामों से जोड़ी जा रही है। भारतीय जनता पार्टी के लिए यह नई रणनीतिक पूंजी है। पार्टी उन्हें हिंदी पट्टी से बाहर भी इस्तेमाल कर सकती है। मैथिली ठाकुर का उभार एक संकेत है। राजनीति अब सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं है। संस्कृति, कला और भावनाएं भी अहम भूमिका निभा रही हैं। आने वाले चुनावों में यह ट्रेंड और मजबूत हो सकता है।