प्रकाश मेहरा | स्पेशल डेस्क |
दिल्ली के मालवीय नगर स्थित हौज़ रानी इलाके में लगी भीषण आग ने मेडिकल टूरिज्म की तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इलाज की उम्मीद लेकर भारत पहुंचे कई विदेशी नागरिक इस हादसे में अपनी जान गंवा बैठे। विदेश मंत्रालय के मुताबिक इस दर्दनाक हादसे में 22 लोगों की मौत हुई, जिनमें 13 विदेशी नागरिक शामिल हैं, जबकि 20 से ज्यादा विदेशी नागरिक घायल हुए हैं। बताया जा रहा है कि इमारत में मौजूद कई लोग इलाज के लिए भारत आए थे और अस्पतालों के नजदीक होने की वजह से इस ठिकाने पर ठहरे हुए थे।
हादसा इतना बड़ा क्यों बना ?
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि जिस बेड एंड ब्रेकफास्ट यूनिट को नियमों के तहत केवल 6 कमरों की मंजूरी थी, वहां कथित रूप से 20 से अधिक कमरे संचालित किए जा रहे थे। इमारत में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई गंभीर सवाल उठे— केवल एक एंट्री और एग्जिट प्वाइंट। बंद गलियारा। वेंटिलेशन की कमी। आपातकालीन निकासी व्यवस्था नहीं। आग के बाद धुएं ने तेजी से पूरी इमारत को अपनी चपेट में ले लिया और कई लोग बाहर नहीं निकल सके।
जान बचाने के लिए लोगों ने लगाई छलांग
हादसे के दौरान कुछ लोग ऊपरी मंजिलों से कूद गए जबकि पुलिस, दमकल विभाग और स्थानीय लोगों ने बचाव अभियान चलाया। इसी बीच सामने आई इंसानियत की एक मिसाल— होटल के सामने मौजूद गद्दे की दुकान के मालिक ने अपनी दुकान के सभी गद्दे सड़क पर बिछा दिए, जिससे कई लोगों की जान बच सकी।
मेडिकल टूरिज्म का बड़ा केंद्र है दिल्ली
भारत कम लागत और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण मेडिकल टूरिज्म का बड़ा केंद्र बन चुका है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में हर साल बड़ी संख्या में विदेशी मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। इनमें हार्ट सर्जरी, कैंसर, किडनी ट्रांसप्लांट, आईवीएफ और अन्य विशेष उपचार शामिल हैं।
लेकिन इस हादसे ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है— क्या इलाज के लिए आने वाले विदेशी और भारतीय मरीजों की ठहरने की व्यवस्था भी उतनी ही सुरक्षित है जितनी स्वास्थ्य सेवाएं ?
पुलिस ने मामले में होटल मालिक और एक कर्मचारी को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि क्या नियमों की अनदेखी और लापरवाही इस त्रासदी की बड़ी वजह बनी। फिलहाल, दिल्ली आग हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं बल्कि सुरक्षा व्यवस्था और जवाबदेही पर बड़ा सवाल बन चुका है।