स्पेशल डेस्क
मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में दल-बदल, बगावत और राजनीतिक गठबंधनों का बदलना कोई नई बात नहीं है। राज्य का राजनीतिक इतिहास ऐसे घटनाक्रमों से भरा पड़ा है, जिन्होंने कई बार सत्ता के समीकरण पूरी तरह बदल दिए। आज शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) में उभरता नया संकट उसी लंबे राजनीतिक इतिहास का हिस्सा माना जा रहा है। आइये इस पूरे विश्लेषण को एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से विस्तार में समझते हैं।
कांग्रेस विभाजन से शुरू हुई राजनीतिक उथल-पुथल
महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े राजनीतिक विभाजनों की पृष्ठभूमि 1969 में कांग्रेस के ऐतिहासिक विभाजन से जुड़ी है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और कांग्रेस संगठन के बीच संघर्ष के बाद पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। इस दौर में महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता यशवंतराव चव्हाण और उनके राजनीतिक शिष्य शरद पवार ने इंदिरा गांधी का साथ दिया।
शरद पवार की पहली बड़ी बगावत
1977 में आपातकाल के बाद कांग्रेस फिर विभाजित हुई। शरद पवार कांग्रेस (यू) के साथ रहे, लेकिन जल्द ही उन्होंने पार्टी से अलग होकर प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) का गठन किया। जनता पार्टी के समर्थन से वे मात्र 38 वर्ष की उम्र में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। यह राज्य के राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी बगावतों में से एक मानी जाती है।
शिवसेना का उदय और भाजपा से गठबंधन
1966 में बालासाहेब ठाकरे ने मराठी अस्मिता के मुद्दे पर शिवसेना की स्थापना की। समय के साथ पार्टी ने मुंबई सहित पूरे महाराष्ट्र में मजबूत जनाधार तैयार किया। बाद में शिवसेना और भाजपा के बीच गठबंधन बना, जो करीब ढाई दशक तक राज्य की राजनीति का प्रमुख केंद्र रहा।
1995 में बनी पहली शिवसेना-भाजपा सरकार
1995 में पहली बार शिवसेना-भाजपा गठबंधन महाराष्ट्र की सत्ता में आया। मनोहर जोशी मुख्यमंत्री और गोपीनाथ मुंडे उपमुख्यमंत्री बने। इसके बाद शिवसेना ने मनोहर जोशी, नारायण राणे और उद्धव ठाकरे के रूप में तीन मुख्यमंत्री दिए।
1999 में एनसीपी का गठन
सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) बनाई। हालांकि चुनाव के बाद कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर सरकार बनाई और शिवसेना-भाजपा गठबंधन को सत्ता से दूर रखा।
2019 की पांच दिन की सरकार
2019 विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा और शिवसेना में विवाद हुआ। इसके बाद देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन यह सरकार केवल पांच दिन ही चल सकी।
इसके बाद शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार बनाई और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने।
2022 में शिवसेना की सबसे बड़ी टूट
जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के अधिकांश विधायकों के साथ बगावत कर दी। उद्धव ठाकरे सरकार गिर गई और शिंदे मुख्यमंत्री बने। बाद में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना तथा पार्टी के तीर-कमान चुनाव चिन्ह का अधिकार दे दिया।
2023 में एनसीपी में भी बगावत
जुलाई 2023 में अजित पवार ने एनसीपी में विद्रोह कर अधिकांश विधायकों को अपने साथ लिया और राज्य सरकार में शामिल हो गए। चुनाव आयोग ने बाद में अजित पवार गुट को असली एनसीपी के रूप में मान्यता दी।
2026 में उद्धव गुट पर नया संकट
2026 में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) के सामने एक नया राजनीतिक संकट खड़ा हो गया है। पार्टी के छह सांसदों द्वारा अलग गुट बनाने की पहल की खबरों ने नए विभाजन की अटकलों को जन्म दिया है।
वर्तमान में महाराष्ट्र विधानसभा में उद्धव गुट सबसे बड़ा विपक्षी दल है, लेकिन उसकी ताकत शिंदे गुट की तुलना में काफी कम है। वहीं, मुंबई महानगरपालिका समेत स्थानीय निकायों में भी पार्टी का प्रभाव लगातार घटा है।
महाराष्ट्र की राजनीति का इतिहास बताता है कि यहां बगावत, दल-बदल और नए राजनीतिक समीकरण सत्ता परिवर्तन का प्रमुख माध्यम रहे हैं। कांग्रेस के विभाजन से शुरू हुई यह परंपरा आज शिवसेना और एनसीपी तक पहुंच चुकी है। ऐसे में 2026 का नया संकट राज्य की राजनीति में एक और बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।