
दिल्ली डेस्क
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता से जुड़े एक अहम मुद्दे पर खुलकर चिंता जताई है। उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के कार्यकाल में जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले से संबंधित कॉलेजियम फैसले पर सवाल उठाते हुए कार्यपालिका के संभावित दखल की कड़ी आलोचना की।
“असुविधाजनक फैसलों की सज़ा ट्रांसफर नहीं हो सकती”
जस्टिस भुइयां ने कहा कि यदि किसी न्यायाधीश का तबादला केवल इस आधार पर किया जाता है कि उसके फैसले सरकार के लिए असुविधाजनक रहे हैं, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। उनके अनुसार, अगर ऐसी वजहों को कॉलेजियम के प्रस्ताव में दर्ज किया जाता है, तो इससे न सिर्फ संबंधित जज की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं, बल्कि पूरे कॉलेजियम सिस्टम की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर खतरा
जस्टिस भुइयां ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद है। यदि जजों को यह संदेश मिलने लगे कि सरकार के खिलाफ फैसले देने पर उन्हें ट्रांसफर का सामना करना पड़ सकता है, तो इससे न्यायिक साहस और स्वतंत्र सोच पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जजों का काम संविधान और कानून के अनुसार निर्णय देना है, न कि यह देखना कि उनके फैसले किसे पसंद आएंगे और किसे नहीं।
कॉलेजियम सिस्टम की निष्पक्षता पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर पहलू, जस्टिस भुइयां के अनुसार, यह है कि यदि कॉलेजियम भी कार्यपालिका के दबाव में फैसले लेता हुआ दिखाई देता है, तो फिर न्यायपालिका की संस्थागत स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता और स्पष्टता की कमी ऐसे विवादों को जन्म देती है, जिससे जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है।
व्यापक बहस की जरूरत
कानूनी जानकारों का मानना है कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी केवल एक तबादले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जजों के तबादले, नियुक्ति प्रक्रिया और कार्यपालिका-न्यायपालिका संबंधों पर एक बड़ी बहस की ओर इशारा करती है। यह मुद्दा एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि—क्या न्यायपालिका बिना किसी डर या दबाव के पूरी स्वतंत्रता से काम कर पा रही है ?