
यूपी डेस्क
बरेली। बरेली के पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के इस्तीफे के बाद प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। इस्तीफा देने के बाद उन्होंने कई गंभीर आरोप लगाए हैं, जिनसे जिला प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसी बीच उनके राजनीति में प्रवेश को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
डीएम आवास की मीटिंग को लेकर गंभीर आरोप
अलंकार अग्निहोत्री ने खुलासा किया कि डीएम आवास पर हुई एक बैठक के दौरान उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया। उनका आरोप है कि मीटिंग के दौरान फोन पर उनके लिए “पागल” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा कि उस समय उन्हें वहां से जाने से रोका गया, जिसे उन्होंने खुद को “बंधक बनाने की कोशिश” बताया।
पूर्व सिटी मजिस्ट्रेट के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम उनके आत्मसम्मान और गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला था, जिसके बाद उन्होंने पद पर बने रहना उचित नहीं समझा।
इस्तीफे के बाद खुलकर बोले अलंकार
इस्तीफा देने के बाद अलंकार अग्निहोत्री ने कहा कि एक अधिकारी होने के नाते वे हमेशा नियमों और संविधान के दायरे में रहकर काम करते रहे हैं। लेकिन जब किसी अधिकारी को अपमान और दबाव का सामना करना पड़े, तो यह न केवल व्यक्तिगत बल्कि संस्थागत समस्या बन जाती है।
इन आरोपों के सामने आने के बाद अलंकार अग्निहोत्री के राजनीति में आने को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे हैं कि क्या वे भविष्य में चुनाव लड़ेंगे या फिर कोई नई राजनीतिक पार्टी बनाएंगे।
क्या बोले अलंकार अग्निहोत्री?
इस सवाल पर उन्होंने फिलहाल सीधा जवाब देने से परहेज किया है। हालांकि उन्होंने इतना जरूर कहा कि “मैं जनता और समाज से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात मजबूती से रखता रहूंगा। आगे क्या करना है, इस पर सोच-विचार चल रहा है।” उनके इस बयान को राजनीति में आने की संभावना के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद प्रशासनिक गलियारों में जहां बेचैनी है, वहीं राजनीतिक दल भी घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। विपक्षी दल इस मुद्दे को शासन-प्रशासन की कार्यशैली से जोड़कर देख रहे हैं।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अलंकार अग्निहोत्री आगे कौन-सा रास्ता चुनते हैं— चुनावी राजनीति, नई राजनीतिक पार्टी, या फिर सार्वजनिक मंच से सिस्टम के खिलाफ आवाज। फिलहाल उनका यह प्रकरण प्रशासनिक गरिमा, अधिकारी की स्वतंत्रता और सत्ता के दबाव जैसे मुद्दों पर नई बहस छेड़ चुका है।