
सरल डेस्क
छठ पर्व, मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख हिंदू पर्व है, जो सूर्य और छठी माई की पूजा को समर्पित है। यह पर्व कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक चार दिनों तक चलता है। इसकी शुरुआत और महत्व को समझने के लिए एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा की इस रिपोर्ट से समझिए।
छठ पर्व की शुरुआत उत्पत्ति
छठ पर्व की उत्पत्ति के बारे में कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, लेकिन इसे प्राचीन वैदिक काल से जोड़ा जाता है। यह सूर्य उपासना की परंपरा से संबंधित है, जो वैदिक संस्कृति में महत्वपूर्ण थी। ऋग्वेद में सूर्य की स्तुति और उनके जीवनदायी गुणों की महिमा का उल्लेख है। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इस पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई, जब द्रौपदी और पांडवों ने सूर्य की उपासना की थी।
एक कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत की रानी मालिनी को संतान प्राप्ति के लिए छठी माई की पूजा करने की सलाह दी गई। उनकी पूजा से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसके बाद यह परंपरा लोकप्रिय हो गई। छठी माई को संतान की रक्षा और दीर्घायु प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से बिहार और पूर्वी भारत में प्रचलित है, लेकिन अब यह देश के अन्य हिस्सों और प्रवासी भारतीयों के बीच भी लोकप्रिय हो रहा है।
सूर्य को अर्घ्य क्यों? सूर्य उपासना का महत्व
सूर्य को जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है। छठ पर्व में सूर्य को अर्घ्य (जल अर्पण) देने की परंपरा इसलिए है क्योंकि सूर्य प्रत्यक्ष रूप से जीवनदायी शक्ति प्रदान करते हैं। वैदिक मान्यता में सूर्य को विश्व की आत्मा (जगत का आत्मा) कहा गया है। सूर्य को अर्घ्य देने की प्रक्रिया में सुबह और शाम के समय सूर्य की किरणों का शरीर पर पड़ना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। यह विटामिन डी की पूर्ति और मानसिक शांति प्रदान करता है। सूर्य की पूजा से मनुष्य के अंदर सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्वास बढ़ता है। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी एक तरीका है।
छठी माई की पूजा क्यों ?
छठी माई को हिंदू मान्यताओं में संतान की रक्षक और कल्याणकारी देवी माना जाता है। इन्हें षष्ठी देवी के रूप में भी जाना जाता है, जो माता पार्वती का ही एक स्वरूप हैं। यह माना जाता है कि छठी माई बच्चों की रक्षा करती हैं और परिवार की सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। छठ पर्व में छठी माई की पूजा विशेष रूप से संतान प्राप्ति, उनकी दीर्घायु और स्वास्थ्य के लिए की जाती है। यह पूजा माताएं अपने बच्चों के लिए करती हैं। छठी माई की पूजा में प्रकृति के तत्वों (जल, सूर्य, पृथ्वी) का महत्व है। यह पर्व प्रकृति और मानव के बीच संतुलन को दर्शाता है।
छठ पर्व की पूरी प्रक्रिया
छठ पर्व चार दिनों तक चलता है, और प्रत्येक दिन का विशेष महत्व है
नहाय-खाय (पहला दिन): इस दिन व्रती (पूजा करने वाले) स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनते हैं और शुद्ध शाकाहारी भोजन (जैसे चावल, दाल, कद्दू की सब्जी) ग्रहण करते हैं। यह दिन पवित्रता और तैयारी का प्रतीक है।
खरना (दूसरा दिन): व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाकर सूर्य भगवान और छठी माई को अर्पित करते हैं। इसके बाद व्रती और परिवारजन प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह उपवास 36 घंटे तक चलता है।
संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन): इस दिन व्रती नदी या जलाशय के किनारे जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य देते हैं। बांस की टोकरी में फल, ठेकुआ, और अन्य प्रसाद चढ़ाए जाते हैं। यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।
उषा अर्घ्य (चौथा दिन): अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद व्रती उपवास तोड़ते हैं और प्रसाद वितरित किया जाता है।
छठ पर्व का महत्व सामाजिक एकता
यह पर्व समुदाय को एकजुट करता है, क्योंकि लोग सामूहिक रूप से घाटों पर पूजा करते हैं। कठिन व्रत और नियमों का पालन करने से आत्मिक शुद्धि और संयम की भावना बढ़ती है। इस पर्व में जलाशयों की सफाई और प्रकृति की पूजा पर जोर दिया जाता है, जो पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देता है। छठ के गीत, ठेकुआ, और अन्य परंपराएं लोक संस्कृति को जीवंत रखती हैं।
आज छठ पर्व केवल बिहार या पूर्वी भारत तक सीमित नहीं है। प्रवासी भारतीय इसे दिल्ली, मुंबई, और विदेशों में भी उत्साह के साथ मनाते हैं। यह पर्व सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन चुका है। छठ पर्व सूर्य और छठी माई की उपासना का एक अनूठा संगम है, जो प्रकृति, स्वास्थ्य, और परिवार के कल्याण को समर्पित है। यह पर्व न केवल आध्यात्मिक बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है।