
सरल डेस्क
चंडीगढ़। जहां अधिकांश लोग 60–65 की उम्र में आराम की जिंदगी चुन लेते हैं, वहीं 88 साल की उम्र में भी समाज के लिए सक्रिय रहना अगर किसी से सीखना हो, तो वह हैं पूर्व DIG सिद्धू। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सेवा की कोई उम्र नहीं होती। देश की स्वच्छता मुहिम में उनके असाधारण योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा है।
चंडीगढ़ के सेक्टर-49 स्थित IAS/IPS सोसायटी में रहने वाले सिद्धू पिछले कई वर्षों से रोज़ाना सफाई अभियान चला रहे हैं। उनकी दिनचर्या अनुशासन और समर्पण की मिसाल है। वे हर सुबह ठीक 7 बजे घर से निकलते हैं और 7 से 8 घंटे तक अपने आसपास की सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई करते हैं।
सुबह की सैर ने बदली सोच
सिद्धू बताते हैं कि ‘एक समय वे सुबह की सैर पर निकलते थे, लेकिन रास्तों पर फैला कचरा उन्हें भीतर तक विचलित कर देता था। उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ शिकायत करने से कुछ नहीं बदलेगा। उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि अगर बदलाव चाहिए तो शुरुआत खुद से करनी होगी। यहीं से उनकी झाड़ू समाज के लिए हथियार बन गई।
‘अब भी समाज का कर्ज बाकी है’
पूर्व DIG रह चुके सिद्धू कहते हैं, “सरकारी सेवा के दौरान मैंने बहुत कुछ पाया है। अब रिटायरमेंट के बाद मुझे लगता है कि समाज का कर्ज अभी बाकी है। जब तक शरीर साथ दे रहा है, मैं यह काम करता रहूंगा।” उनका मानना है कि स्वच्छता सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। वे लोगों को न सिर्फ सफाई के लिए प्रेरित करते हैं, बल्कि खुद उदाहरण बनकर सामने खड़े होते हैं।
लोगों के लिए प्रेरणा बने सिद्धू
उनकी उम्र और ऊर्जा को देखकर आसपास के लोग हैरान भी होते हैं और प्रेरित भी। कई युवा और स्थानीय निवासी उनके साथ सफाई अभियान में जुड़ने लगे हैं। सिद्धू का यह प्रयास अब एक जन आंदोलन का रूप लेता जा रहा है।
पद्मश्री से मिला राष्ट्रीय सम्मान
भारत सरकार द्वारा उन्हें पद्मश्री सम्मान दिया जाना सिर्फ एक व्यक्ति का सम्मान नहीं, बल्कि उस सोच का सम्मान है, जो कहती है कि बदलाव पद या उम्र का मोहताज नहीं होता। 88 साल की उम्र में झाड़ू उठाकर सड़कों पर उतरना आसान नहीं होता, लेकिन सिद्धू ने दिखा दिया कि अगर इरादा मजबूत हो, तो सेवा ही सबसे बड़ा सम्मान बन जाती है।