
स्पेशल डेस्क | नई दिल्ली
नई दिल्ली की सर्द सुबह में जब राज्यसभा की कार्यवाही शुरू हुई, तो सदन के भीतर एक ऐसी आवाज गूंजी जिसने सत्ता और व्यवस्था—दोनों से सीधे सवाल किए। बजट सत्र 2026 के दौरान आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने जनहित के कई अहम मुद्दों को उठाते हुए सरकार को कठघरे में खड़ा किया। उनकी मांगें केवल राजनीतिक बयान नहीं थीं, बल्कि आम नागरिकों की रोजमर्रा की परेशानियों और लोकतांत्रिक जवाबदेही की पुकार के रूप में सामने आईं।
‘राइट टू रिकॉल’: जनता के हाथ में जनप्रतिनिधियों की लगाम
शून्यकाल के दौरान राघव चड्ढा ने सबसे पहले जिस मुद्दे को उठाया, वह था—‘राइट टू रिकॉल’ यानी जनप्रतिनिधि को कार्यकाल पूरा होने से पहले हटाने का अधिकार। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि कोई सांसद या विधायक अपने कर्तव्यों का निर्वहन ठीक से नहीं करता, जनता की समस्याओं से मुंह मोड़ लेता है या जवाबदेही से बचता है, तो मतदाताओं के पास उसे हटाने का संवैधानिक अधिकार होना चाहिए।
यह मांग सीधे तौर पर प्रतिनिधियों की जवाबदेही से जुड़ी है। चड्ढा का तर्क था कि पांच साल का कार्यकाल “बिना शर्त सुरक्षा कवच” नहीं होना चाहिए। जनता ने चुना है, तो जनता को ही अंतिम निर्णय का अधिकार भी मिलना चाहिए।
मध्यम वर्ग की पीड़ा: ‘टैक्स तो बढ़ता है, राहत क्यों नहीं ?’
बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए चड्ढा ने इसे मध्यम वर्ग के लिए “निराशाजनक” करार दिया। उन्होंने कहा कि महंगाई लगातार बढ़ रही है, लेकिन आयकर स्लैब में कोई ठोस संशोधन नहीं किया गया। उन्होंने मानक कटौती (Standard Deduction) को ₹75,000 से बढ़ाकर ₹1.5 लाख करने की मांग की, ताकि वेतनभोगी वर्ग को वास्तविक राहत मिल सके।
उनका कहना था कि “देश का मध्यम वर्ग टैक्स की रीढ़ है, लेकिन बजट में उसके लिए ठोस सहारा नहीं दिखता।”
यह बयान उन लाखों नौकरीपेशा लोगों की चिंता को स्वर देता है, जो हर महीने बढ़ती कीमतों और स्थिर आय के बीच संतुलन बनाने की जद्दोजहद में लगे हैं।
महंगाई बनाम वेतन: ‘मुद्रास्फीति-लिंक्ड वेतन संशोधन’ का प्रस्ताव
चड्ढा ने महंगाई के असर को रेखांकित करते हुए “मुद्रास्फीति-लिंक्ड वेतन संशोधन अधिनियम” लाने का प्रस्ताव रखा।उन्होंने तर्क दिया कि जब हर साल आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, तो वेतन वृद्धि भी उसी अनुपात में सुनिश्चित होनी चाहिए। उनके अनुसार, यह केवल आर्थिक सुधार नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न है। उन्होंने कहा कि “यदि महंगाई स्वचालित रूप से बढ़ सकती है, तो वेतन वृद्धि भी स्वचालित रूप से क्यों नहीं हो सकती?”
सार्वजनिक स्वास्थ्य: आंकड़ों के पीछे छिपी सच्चाई
सदन में उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कम बजटीय आवंटन पर भी चिंता जताई। चड्ढा ने कहा कि “भारत में स्वास्थ्य पर जीडीपी का लगभग 0.5% खर्च किया जा रहा है, जबकि 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में 2.5% का लक्ष्य तय किया गया था। उन्होंने सवाल उठाया कि “यदि स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत नहीं होगी, तो विकास का दावा अधूरा रहेगा।” कोविड-19 महामारी की याद दिलाते हुए उन्होंने स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ करने की आवश्यकता पर बल दिया।
ब्लॉकचेन आधारित भूमि रजिस्ट्री: भ्रष्टाचार पर तकनीकी प्रहार
भूमि विवादों और संपत्ति धोखाधड़ी की समस्याओं को रेखांकित करते हुए चड्ढा ने सभी भूमि और संपत्ति रिकॉर्ड को ब्लॉकचेन आधारित डिजिटल सिस्टम पर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया। उनका मानना है कि “पारदर्शी और छेड़छाड़-रोधी तकनीक से जमीन से जुड़े विवाद और भ्रष्टाचार में कमी लाई जा सकती है। यह प्रस्ताव प्रशासनिक सुधार और तकनीकी आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल
सदन में उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि “सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की व्यवस्था में बदलाव कर कैबिनेट मंत्री को शामिल करना चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करता है। उनका तर्क था कि “लोकतंत्र की मजबूती के लिए चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वतंत्रता सर्वोपरि है।”
लोकतंत्र की नई बहस..जवाबदेही बनाम सत्ता
राघव चड्ढा के इन मुद्दों ने सदन के भीतर और बाहर दोनों जगह बहस को जन्म दिया है। जहां एक ओर उनके प्रस्तावों को लोकतांत्रिक जवाबदेही और पारदर्शिता की दिशा में कदम माना जा रहा है, वहीं राजनीतिक हलकों में इन मांगों पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—इस बजट सत्र में उन्होंने उन सवालों को उठाया है जो सीधे आम नागरिक के जीवन से जुड़े हैं:- क्या जनप्रतिनिधि जवाबदेह होंगे ? क्या मध्यम वर्ग को राहत मिलेगी ? क्या स्वास्थ्य और चुनाव जैसी संस्थाएं मजबूत होंगी ? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में तय करेंगे कि लोकतंत्र केवल प्रक्रिया रहेगा या सच में जनता की शक्ति बनेगा।