
स्पेशल डेस्क
पिछले चार वर्षों (2021-2025) में भारत के चार पड़ोसी देशों—अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल—में राजनीतिक उथल-पुथल ने सत्ता परिवर्तन को जन्म दिया है। ये घटनाएं जनाक्रोश, आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार और सामाजिक मीडिया के प्रभाव से उपजी हैं। इन्हें ‘तख्तापलट’ कहा जा रहा है, हालांकि ये पारंपरिक सैन्य तख्तापलट नहीं, बल्कि जन आंदोलनों या विद्रोही समूहों के दबाव से हुए परिवर्तन हैं। ये बदलाव दक्षिण एशिया की स्थिरता को प्रभावित कर रहे हैं, जहां भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति पर सवाल उठ रहे हैं।
अफगानिस्तान तालिबान का कब्जा (2021)
अफगानिस्तान में 2021 में तालिबान ने तेजी से सत्ता हथिया ली, जो एक सैन्य तख्तापलट जैसा था। अमेरिकी सेना की वापसी के बाद अफगान सरकार ढह गई। 1 मई 2021 को अमेरिकी सेना की पूर्ण वापसी की घोषणा के बाद तालिबान ने मई से आक्रामक अभियान शुरू किया। 15 अगस्त 2021 को वे काबुल पहुंचे और राष्ट्रपति अशरफ गनी को भागना पड़ा। तालिबान ने ‘इस्लामिक अमीरात’ घोषित किया।
20 साल के युद्ध के बाद अमेरिका-तालिबान समझौते (फरवरी 2020) ने विदेशी सेना की वापसी तय की, लेकिन तालिबान ने अपनी सैन्य ताकत बढ़ाई। अफगान सरकार की कमजोरी, भ्रष्टाचार और सैन्य विफलता ने स्थिति बिगाड़ी। तालिबान ने सख्त शरिया कानून लागू किया, महिलाओं के अधिकारों पर पाबंदियां लगाईं, शिक्षा और रोजगार सीमित किया। अर्थव्यवस्था चरमरा गई—GDP 26% सिकुड़ गया, 23 मिलियन लोग भुखमरी के कगार पर। ISKP जैसे समूह सक्रिय हैं।
भारत ने तालिबान को मान्यता नहीं दी। सीमा सुरक्षा बढ़ी, कट्टरवाद का खतरा बढ़ा। भारत ने मानवीय सहायता दी, लेकिन अफगानिस्तान में पाकिस्तान-चीन प्रभाव बढ़ा।
श्रीलंका आर्थिक संकट से जन विद्रोह (2022)
श्रीलंका में 2022 का आर्थिक पतन जन आंदोलन में बदल गया, जिससे राष्ट्रपति को भागना पड़ा।घटनाक्रम: 2022 की शुरुआत में ईंधन, दवा और भोजन की कमी हुई। अप्रैल में कर्ज डिफॉल्ट। जुलाई में बड़े प्रदर्शन हुए, 13 जुलाई को राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे भागे। रणिल विक्रमसिंघे राष्ट्रपति बने।
राजपक्षे परिवार की नीतियां—कर कटौती, जैविक खेती पर जोर (जिससे फसलें बर्बाद हुईं), विदेशी कर्ज (GDP का 100%) और COVID-19 से पर्यटन प्रभावित। महंगाई 70% पहुंची। IMF से $3 बिलियन का पैकेज मिला, लेकिन बेरोजगारी 8.3% बढ़ी। 2024 में अनुरा कुमारा दिसानायके राष्ट्रपति बने। अर्थव्यवस्था सुधरी, लेकिन गरीबी दोगुनी। भारत ने $4 बिलियन से अधिक सहायता दी। श्रीलंका में चीन का प्रभाव कम हुआ, लेकिन भारत की ‘सागर’ नीति मजबूत हुई।
बांग्लादेश छात्र आंदोलन से हसीना का पतन (2024)
बांग्लादेश में छात्र प्रदर्शन ने प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से बेदखल कर दिया। जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों में कोटा सुधार की मांग से शुरू हुए प्रदर्शन हिंसक हुए। 5 अगस्त को हसीना ने इस्तीफा दिया और भारत भागीं। मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनी।
हसीना की 15 साल की सत्ता में भ्रष्टाचार, चुनाव धांधली (2024 चुनाव बॉयकॉट) और दमन। कोटा प्रथा ने युवाओं को नाराज किया। आंदोलन ‘जुलाई क्रांति’ कहलाया। 1,400 से अधिक मौतें। अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हमले बढ़े। अर्थव्यवस्था पटरी पर, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता। 2025 चुनाव की तैयारी। हसीना भारत समर्थक थीं, अब यूनुस सरकार में चीन का प्रभाव बढ़ा। सीमा तनाव, हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा चिंता। भारत ने सहायता जारी रखी।
नेपाल Gen-Z प्रदर्शन से ओली का इस्तीफा (2025)
में सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार के खिलाफ युवा आंदोलन ने प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देने पर मजबूर किया। सितंबर 2025 में सोशल मीडिया (फेसबुक, इंस्टाग्राम) बैन से Gen-Z (युवा) प्रदर्शन शुरू। 8-9 सितंबर को हिंसा, 19 मौतें। संसद भवनों पर हमले, कर्फ्यू। 9 सितंबर को ओली ने इस्तीफा दिया।
भ्रष्टाचार, नेपोटिज्म (नेता परिवारों की फिजूलखर्ची), आर्थिक मंदी (प्रति व्यक्ति आय $1,300)। सोशल मीडिया पर #NepoBabies ट्रेंड। श्रीलंका-बांग्लादेश प्रदर्शनों से प्रेरणा। अंतरिम सरकार, कर्फ्यू। राजशाही बहाली की मांगें (मार्च 2025 में हिंसा)। अर्थव्यवस्था प्रभावित, लेकिन युवा नेतृत्व उभरा। नेपाल में अस्थिरता से सीमा सुरक्षा चिंता। भारत ने सहायता दी, लेकिन चीन का प्रभाव बढ़ा।
तुलनात्मक विश्लेषण, एक तालिका में देश

ये घटनाएं जन-आधारित हैं, लेकिन चीन-पाकिस्तान का हाथ संदिग्ध। दक्षिण एशिया में कट्टरवाद, शरणार्थी और सीमा विवाद बढ़े।
भारत की नीति
‘नेबरहुड फर्स्ट’ के तहत भारत ने सहायता बढ़ाई ($10 बिलियन+ कुल), लेकिन नई सरकारें (जैसे बांग्लादेश, नेपाल) में चीन झुकाव चिंता। जयशंकर ने मालदीव, श्रीलंका, नेपाल यात्राएं कीं। 2025 में चुनाव (बांग्लादेश, नेपाल) महत्वपूर्ण। भारत को आर्थिक सहायता, कूटनीति और सुरक्षा पर फोकस करना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि ये बदलाव भारत के लिए अवसर भी हैं, अगर सही संतुलन बने।