
स्पेशल डेस्क
वॉशिंगटन। अमेरिका में एक नया विधायी प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक व्यापार में नई बहस को जन्म दे रहा है। इस प्रस्तावित विधेयक में भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे देशों पर रूसी तेल की खरीद जारी रखने की स्थिति में 500 प्रतिशत तक का दंडात्मक टैक्स (टैरिफ) लगाने का प्रावधान शामिल बताया गया है। यह कदम यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर दबाव बढ़ाने की अमेरिकी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
क्या है प्रस्तावित विधेयक ?
अमेरिकी कांग्रेस में पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य रूस की ऊर्जा आय को सीमित करना है, जो उसके युद्ध प्रयासों का एक प्रमुख आर्थिक आधार मानी जाती है। विधेयक के तहत, यदि कोई देश रूस से कच्चा तेल या पेट्रोलियम उत्पाद खरीदता है, तो उसके निर्यात पर अमेरिका भारी टैरिफ लगा सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह टैरिफ सामान्य व्यापार शुल्क से कहीं अधिक, लगभग 500 प्रतिशत तक हो सकता है।
किन देशों पर पड़ेगा असर ?
भारत, चीन और ब्राज़ील वर्तमान में रूसी तेल के बड़े खरीदारों में शामिल हैं। विशेष रूप से भारत ने यूक्रेन युद्ध के बाद रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया है, जिससे उसकी ऊर्जा ज़रूरतें और मुद्रास्फीति पर नियंत्रण संभव हुआ है। ऐसे में प्रस्तावित अमेरिकी कदम इन देशों के साथ व्यापारिक संबंधों पर असर डाल सकता है।
अमेरिका की मंशा
अमेरिकी प्रशासन और कुछ सांसदों का तर्क है कि रूसी तेल की खरीद अप्रत्यक्ष रूप से मॉस्को को आर्थिक संबल देती है। इसलिए, द्वितीयक प्रतिबंधों या ऊंचे टैरिफ के ज़रिए रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर दबाव बनाया जाना चाहिए, ताकि वे अपनी ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार करें।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और चिंताएं
विशेषज्ञों का मानना है कि “यदि यह विधेयक कानून बनता है, तो इससे वैश्विक व्यापार प्रणाली में तनाव बढ़ सकता है।विकासशील देशों का तर्क है कि वे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू आर्थिक हितों के आधार पर निर्णय लेते हैं, न कि किसी भू-राजनीतिक गठबंधन के दबाव में।
भारत सहित कई देशों ने पहले भी स्पष्ट किया है कि “ऊर्जा खरीद उसके राष्ट्रीय हितों से जुड़ा मामला है और वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में रहकर स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता है।
यूक्रेन युद्ध का प्रभाव केवल युद्धक्षेत्र तक
फिलहाल यह विधेयक प्रस्ताव के स्तर पर है और इसके कानून बनने की प्रक्रिया में संसदीय बहस, संशोधन और राजनीतिक सहमति जैसी कई बाधाएं हैं। हालांकि, इसने यह स्पष्ट कर दिया है कि यूक्रेन युद्ध का प्रभाव केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाज़ार और कूटनीतिक संबंधों को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है।